बेवफ़ा कौन? Who is Unfaithful?

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ज़िन्दगी तो बेवफ़ा है,

जाने कब गले लगा ले

और कब ख़फा हो जाये,

पर मौत अपने वादे से

कभी नहीं मुकरती

बस एक बार जो गले लगती है

सदा के लिए अपना बना लेती है!

 

Life is two faced

one never knows,

when it embraces

or when it leaves us bitter

but, death never goes

back on its word

once it embraces you

it makes you its own!

 

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ज़िन्दगी का आईना – Mirror of Life

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ज़िन्दगी के आईने में चेहरा देखा

पहचान न सका अपने आप को

नीरस आखें, झुर्रियों से भरा मुँख

अपने अक्स से डर गया मै

इस ज़िन्दगी के भाग दौड़ में,

काम का नशा इतना छा गया

कि मुस्कुराना भूल गया,

छोटी छोटी खुशियों से मुँह फेर लिया

सफलता की बुलंदी तो छू ली

रुकना नहीं आया मुझे

मकान था आलिशान

पर वो घर न बन पाया

परिवार अजनबी लगने लगा

खुद को पाया अकेला, तनहा इतना कि,

मेरा साया भी मेरा न रहा .

 

Looking at the mirror of  life

I could not recognize myself.

Hollow eyes, a wrinkled face

was aghast at my reflection.

In the rat race of life

work became my obsession.

Forgot the art of smiling

became oblivious to life’s tiny delights.

Kissed the pinnacle of success

but didn’t learn to pause.

Built a palatial house

but it missed out on being a home.

My family seemed strangers

found myself so lonely and desolate, that

even my shadow was not mine anymore!

 

बचपन के दिन – Childhood days!

दूर गगन के छाव में, फुरसत के पलों के साथ ,

गुज़रा ज़िन्दगी के कुछ बेहतरीन साल, जिसे हम बचपन कहते थे

*

तेज़ धूप में खेला दिन भर, बेख़ौफ़ दोस्तों के संग,

न थी समय की परवाह, न था पढ़ाई का ज़ोर,

*

कभी कू छुक छुक रेलगाड़ी, तो कभी बरसात के पानी में चलती अपनी नाव

तितलियां पकड़ना, पडोसी के आम चुराना,दिन अपने बीते खूब निराले

*

टीचर की छड़ी की मार या कक्षा में मुर्गा  बनने पर भी,

न कोई शिकवा था, न कोई शिकायत

*

याद है मुझे बाबा की डांट, फिर काँधे पर भिठाकर सैर कराना,

माँ की हाथ के खाने पर उंगलिया छांटते रह जाना

*

छोटे थे ख्वाब हमारे, छोटी थी खुशियां, ज़रूरते थी छोटी हमारी

बस एक ही आस है अभी, कोई लौटा दे वो गुज़रे बचपन के दिन

*

Childhood Days

Under the open sky, with plenty of moments of leisure

we spent a handful of beautiful years, our childhood!

*

Playing all day long in the blazing sun, along with friends

without a bother of  time nor studies.

*

Puff puff went our train, our paper boats sailed in the rain water

Catching butterflies, stealing mangoes from the neighbour’s garden

Oh! those were days of sheer bliss.

*

In spite of the teachers caning, and punishing us in class

we had no issues or complaints.

*

I still remember Dad’s scolding,

then carrying us on his shoulder for an outing,

and mom’s finger licking cooking.

*

Our dreams, happiness and necessities, all were small,

Can someone return my  bygone days of childhood ?

 

तलाश – The Search….

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image courtesy: hiwassee.edu

ऐ मालिक, तेरे तलाश में निकल पड़ा था

गलियों में, चौराहो में,

किताबों के पन्नो में, कोहरे के धुंध में,

समुन्दर की गहराइयो में, आकाश की ऊंचाइयों में,

तन्हाई और ख़ामोशी में,

वाद विवाद में, गुणीजनों के सांगत में,

मंदिर, मस्जिद और गिरिजाघरों में,

हर जगह ढूँढा तुझे,

तपस्या की, आराधना की,

पर आँखों से ओझल रहा  तू .

 

फिर हुआ एक अजूबा, ज़िन्दगी ने तुझसे मिला दिया,

समझ गया मैं, कि तू बसता है हर दिल में,

हर रचना में, तेरी हर  सृष्टि में,

सूरज की रोशनी में,  चन्द्रमा की चांदनी में,

खेतो खलियानो में, बदलती ऋतुओ में,

हर प्यार भरे स्पर्श में, माँ के आँचल में,

लोगों के मुस्कानों में, बुज़ुर्गों के आशीर्वाद में,

हर अनाज के दाने में, हर पानी के बूँद में,

तू बसता है हर अच्छाई में, मानवता में,

हे सृष्टि के निर्माता , जब तू है चारो ओर,

न जाने मेरी आँखें तुझे क्यों न पहचान सकी?

जब आँखों से गुर्रूर का  परदा हट गया,

तब दर्शन और एहसास हुआ तेरा.

ऐ मालिक, तुझे इस नाचीज़ का शत शत प्रणाम!

 

The Search

O lord, I set out in search of you

in the lanes and by lanes,

in the pages of books, in the blanket of fog,

in the depths of the ocean, in the expanse of the sky

in solitude and in silence.

In discourses and in the company of wise men,

in temples, mosques and churches.

I looked for you every where.

I meditated and prayed,

but you remained elusive!

 

It was magical when life introduced you to me

I realized that you reside in every heart!

In every composition, in all your creations.

In the rays of the sun, in the moonlight,

in the fields, in the changing seasons.

In every touch full of love, in mother’s care,

in the smiles of  people, in the blessings of  elders,

in every grain of rice , in every drop of water

you reside in every kind act, in humanity.

O the Creator of the universe, when you are all around

I wonder why my eyes failed to recognize you?

It was only when I shed my veil of ignorance,

I saw and experienced you.

O lord, please accept my humble salutations!

 

 

 

 

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